मन की बात : छठ महापर्व संस्कृति, प्रकृति और समाज के बीच की गहरी एकता का प्रतीक : प्रधानमंत्री

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में रविवार को छठ महापर्व की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने इसे संस्कृति, प्रकृति और समाज के बीच की गहरी एकता का प्रतीक बताया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि छठ के घाटों पर समाज का हर वर्ग एक साथ खड़ा होता है, जो भारत की सामाजिक एकता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने देशवासियों से आग्रह किया कि यदि अवसर मिले तो इस पर्व में जरूर भाग लें। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय समाज की एकता और समरसता का भी प्रतीक है।

‘मन की बात’ के 127वें एपिसोड में प्रधानमंत्री ने त्योहारों, संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण, युवाओं की पहल, देसी नस्ल के कुत्तों को बढ़ावा, संस्कृत का पुनर्जागरण और राष्ट्रगीत ‘वन्देमातरम्’ जैसे विषय शामिल किए। प्रधानमंत्री छठ महापर्व की शुभकामनाएँ देते हुए बिहार, झारखंड और पूर्वांचल के लोगों को विशेष बधाई दी और देशवासियों से पर्व में हिस्सा लेने का आग्रह किया।

हैदराबाद का स्वतंत्रता संग्राम और कोमरम भीम

हैदराबाद के स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने निजाम के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने वाले कोमरम भीम के बारे में बताया। 22 अक्टूबर को ही उनकी जन्म-जयंती मनाई गई थी।

उन्होंने कहा कि 20वीं सदी के प्रारंभ में हैदराबाद में निज़ाम के अत्याचार के खिलाफ देशभक्तों का संघर्ष चरम पर था। गरीब और आदिवासी समुदायों पर अत्याचार और भारी कर लगाए जा रहे थे। उस समय कोमरम भीम ने सिद्दीकी नामक अधिकारी को चुनौती दी और निज़ाम के अत्याचार के खिलाफ कई वर्षों तक संघर्ष किया।

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उन्होंने बताया कि उस दौर में जब निज़ाम के खिलाफ एक शब्द बोलना भी गुनाह था। उस नौजवान ने सिद्दीकी नाम के निज़ाम के एक अधिकारी को खुली चुनौती दे दी थी। निज़ाम ने सिद्दीकी को किसानों की फसलें जब्त करने के लिए भेजा था लेकिन अत्याचार के खिलाफ इस संघर्ष में उस नौजवान ने सिद्दीकी को मौत के घाट उतार दिया। वे गिरफ़्तारी से बच निकलने में भी कामयाब रहे।

निज़ाम की अत्याचारी पुलिस से बचते हुए वे सैकड़ों किलोमीटर दूर असम जा पहुंचे। कोमरम भीम ने 40 वर्ष की आयु में कई आदिवासी समाजों में अमिट छाप छोड़ी। निज़ाम की सत्ता के लिए वे बहुत बड़ी चुनौती बन गए थे। 1940 में निज़ाम के लोगों ने उनकी हत्या कर दी थी।उनके जीवन को प्रेरणादायक बताते हुए प्रधानमंत्री ने आग्रह किया कि युवा उनके बारे में अधिक से अधिक जानने का प्रयास करें।

स्वदेशी नस्ल के श्वानों को बढ़ावा देने पर जोर

प्रधानमंत्री ने आज सुरक्षा बलों में भारतीय नस्ल के श्वानों को अपनाने और प्रशिक्षित करने की सराहना की। उन्होंने बताया कि पांच वर्ष पहले उन्होंने देशवासियों और सुरक्षा बलों से भारतीय नस्ल के कुत्तों को अपनाने का आग्रह किया था। बीएसएफ और सीआरपीएफ ने अपने दस्तों में भारतीय नस्ल के कुत्तों की संख्या बढ़ाई है। बीएसएफ का नेशनल ट्रेनिंग सेंटर ग्वालियर के टेकनपुर में है।

यहां रामपुर हाउंड, मुधोल हाउंड और अन्य भारतीय नस्लों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इन श्वानों के लिए प्रशिक्षण मैनुअल को भी संशोधित किया गया है ताकि उनकी विशेष क्षमताओं को उजागर किया जा सके।प्रधानमंत्री ने कहा, “भारतीय नस्ल के श्वान अपने परिवेश और परिस्थितियों के अनुसार जल्दी ढल जाते हैं।”

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उन्होंने कहा कि सीआरपीएफ के बेंगलुरु स्थित डॉग ब्रीडिंग और ट्रेनिंग स्कूल में मोंग्रेल्स, मुधोल हाउंड, कोम्बाई और पांडिकोना जैसी भारतीय नस्लों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। पिछले वर्ष लखनऊ में आयोजित ऑल इंडिया पुलिस ड्यूटी मीट में मुधोल हाउंड रिया ने विदेशी नस्लों को पीछे छोड़कर पहला पुरस्कार जीता था।

उन्होंने बताया कि अब बीएसएफ ने अपने श्वानों को विदेशी नामों के बजाय भारतीय नाम देने की परंपरा शुरू की है। हमारे यहाँ के देशी श्वान ने अद्भुत साहस भी दिखाया है। पिछले वर्ष, छतीसगढ़ के माओवाद से प्रभावित रहे क्षेत्र में गश्त के दौरान सीआरपीएफ के एक देसी श्वान ने 8 किलोग्राम विस्फोटक का पता लगाया था।

भारत का राष्ट्रगीत ‘वन्देमातरम्’

भारत का राष्ट्रगीत 7 नवंबर को ‘वन्देमातरम्’ 150 वर्ष पूरा करने जा रहा है। इस विषय पर प्रधानमंत्री ने देशवासियों से सुझाव मांगे। उन्होंने कहा कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत मातृभूमि के प्रति भाव और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार गाया। पीएम ने इस अवसर को यादगार बनाने के लिए #VandeMatram150 के तहत सुझाव भेजने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा, “वन्देमातरम्’ भले ही 19वीं शताब्दी में लिखा गया था लेकिन इसकी भावना भारत की हजारों वर्ष पुरानी अमर चेतना से जुड़ी थी। वेदों ने जिस भाव को “माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:” कहकर भारतीय सभ्यता की नींव रखी थी। बंकिमचंद्र जी ने ‘वन्देमातरम्’ लिखकर मातृभूमि और उसकी संतानों के उसी रिश्ते को भाव विश्व में एक मंत्र के रूप में बांध दिया था।”

सरदार पटेल की जयंती और रन फॉर यूनिटी

प्रधानमंत्री ने कहा कि 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की 150वीं जयंती मनाई जाएगी। प्रधानमंत्री ने देशवासियों से ‘रन फॉर यूनिटी’ में भाग लेने का आग्रह किया। सरदार पटेल ने आधुनिक भारत के ब्यूरोक्रैटिक फ्रेमवर्क की नींव रखी और देश की एकता और अखंडता के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।

संस्कृत पुनर्जागरण और युवा पहल

प्रधानमंत्री ने कहा कि संस्कृत भाषा को नई प्राणवायु देने के लिए युवा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय हैं। उन्होंने कहा कि भाषा किसी भी सभ्यता की पहचान होती है और युवाओं के प्रयास से संस्कृत फिर से लोकप्रिय हो रही है।

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उन्होंने कुछ उदाहरण भी दिए। जैसे यश सालुंड्के क्रिकेट कमेंट्री संस्कृत में करते हैं, जबकि कमला और जान्हवी अध्यात्म और संगीत पर सामग्री प्रस्तुत करती हैं। ‘संस्कृत छात्रोहम्’ चैनल शिक्षण और हास-परिहास के माध्यम से संस्कृत का प्रचार कर रहा है। भावेश भीमनाथनी श्लोक और आध्यात्मिक सिद्धांत साझा करते हैं।

अम्बिकापुर: प्लास्टिक कचरा और गार्बेज कैफे की पहल

मन की बात में प्रधानमंत्री ने छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर में प्लास्टिक कचरे को लेकर एक अनोखी पहल के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अम्बिकापुर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन द्वारा चलाए जा रहे गार्बेज कैफे में प्लास्टिक कचरा लाने पर मुफ्त भोजन उपलब्ध कराया जाता है। यदि कोई व्यक्ति एक किलो प्लास्टिक लाता है तो उसे दोपहर या रात का खाना मिलता है और आधा किलो लाने पर नाश्ता। इस पहल से शहर की स्वच्छता में सुधार के साथ-साथ लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है।

बेंगलुरु : झीलों और पर्यावरण संरक्षण का अभियान

एपिसोड में प्रधानमंत्री मोदी ने कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में इंजीनियर कपिल शर्मा के झीलों को पुनर्जीवित करने और पेड़ लगाने के अभियान की सराहना की। उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने बेंगलुरु और आसपास के इलाकों में 40 कुँओं और 6 झीलों को पुनर्जीवित किया। इस मिशन में स्थानीय लोगों और कॉर्पोरेट्स को शामिल किया गया। प्रधानमंत्री ने इसे देश में बदलाव और पर्यावरण संरक्षण की प्रेरक मिसाल बताया।

गुजरात : मैंग्रोव प्लांटेशन और समुद्री जीवन

गुजरात के धोलेरा और कच्छ में मैंग्रोव प्लांटेशन का कार्य तेजी से जारी है। धोलेरा में पांच साल पहले शुरू हुए इस अभियान में अब 3,500 हेक्टेयर में मैंग्रोव फैल चुके हैं। इसके बारे में बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इसका सीधा असर समुद्री जीव-जंतुओं पर देखा जा रहा है, जैसे कि डॉल्फ़िन, केकड़े और प्रवासी पक्षी। कच्छ के कोरी क्रीक में मैंग्रोव लर्निंग सेंटर भी स्थापित किया गया है।

उन्होंने कहा, “पेड़-पौधों की, वृक्षों की यही तो खासियत होती है। जगह चाहे कोई भी हो, वो हर जीव मात्र की बेहतरी के लिए काम आते हैं। हमारे ग्रन्थों में कहा गया है –धन्या महीरूहा येभ्यो, निराशां यान्ति नार्थिनः।। अर्थात्, वो वृक्ष और वनस्पतियाँ धन्य हैं, जो किसी को भी निराश नहीं करते। हमें भी चाहिए, हम जिस भी इलाके में रहते हैं, पेड़ अवश्य लगाएं। ‘एक पेड़ माँ के नाम’ के अभियान को हमें और आगे बढ़ाना है।”

भारतीय कॉफी : विविधता

प्रधानमंत्री ने ओडिशा के कोरापुट में कॉफी की खेती बढ़ाने का उदाहरण देते हुए कहा कि लोग कॉफी के प्रति अपने जुनून के कारण इस क्षेत्र में आए और सफल हो रहे हैं। भारत के विभिन्न राज्यों में कॉफी की खेती हो रही है, जैसे कर्नाटक के चिकमंगलुरु, कुर्ग, हासन; तमिलनाडु के नीलगिरी और अन्नामलाई; केरल के त्रावणकोर और मालाबार। भारत की कॉफी वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध हो रही है।

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